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देवभूमि भारत की आन-बान-शान और भक्ति-शक्ति-संघर्ष की प्रतीक वीर प्रसूता मरू भूमि राजस्थान की अरावली पर्वत श्रृंखला की गोद में अवस्थित वर्तमान में उभरती हुई लघुकाशी (शिक्षा नगरी) गुढा गौडजी में जून १९८९ में स्थापित टैगोर शिक्षा समिति ने समय की नब्ज़ पहचानते हुए अन्तराष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी की उपयोगिता एवं उपादेयता समझते हुए एवं दूरदर्शिता और अग्रिम सोच का परिचय देते हुए १ जुलाई २००४ में खुले एवं शुद्ध वातावरण में अंग्रेजी माध्यम विद्यालय टैगोर पब्लिक स्कूल का शुभारम्भ किया जो स्थापना से आज तक पल्लवित, पुष्पित एवं फलित होकर विशाल वटवृक्ष का रूप धारण कर निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसित है I विद्यालय ने मात्रात्मक, गुणात्मक, शैक्षिक, सहशैक्षिक, भौतिक सुविधाओं आदि सभी क्षेत्रों में सफलता के सोपान पर अग्रसर रहते हुए नयी-नयी ऊँचाइयों को छुआ है I तीव्र वैश्वीकरण के वर्तमान युग में शिक्षा क्षेत्र से सम्बद्ध प्रत्येक संस्था एवं ब्यक्ति के दायित्व में वृद्धि हुई है I बालक को विश्व स्तरीय कड़ी प्रतिस्पर्धा में सफल बनाने के साथ राष्ट्रीय मूल्यों, आदर्शों और संस्कृति की रक्षा करना बहुत बड़ी चुनौती है I 'मै विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य हूँ मेरे शरीर में जो प्राण वायु या आत्मा है वह स्वयं परमात्मा का ही स्वरुप है, इसलिए मेरी शक्ति, योग्यता और सामर्थ्य असीमित है मुझे इस असीमित शक्ति के बल पर अपने कर्मक्षेत्र में नंबर एक बनना है I ' यह भाव यहाँ के बच्चे-बच्चे में होता है I स्वामी विवेकानंद के शब्दों में इसे पश्चिमी भौतिकवाद और पूर्वी अध्यात्मवाद का सामंजस्य कह सकते हैं I बालक को प्रोत्साहित करते हुए निष्काम कर्मयोग के मार्ग पर गतिशील करने से ही यह संभव है I यहाँ के विद्यार्थी ब्राह्य दृष्टि से आधुनिक नज़र आते हैं परन्तु ह्रदय से सच्चे राष्ट्रप्रेमी हिदुस्तानी होते हैं I "शिशुओं की शिक्षा के लिए 'स्कूल' नाम से जिस यन्त्र का निर्माण हुआ है उसके द्वारा शिशु की शिक्षा पूर्ण नहीं हो सकती I सच्ची शिक्षा के लिए आश्रम की आवश्यकता है जहाँ समग्र जीवन की सजीव पृष्ठभूमि विद्यमान होती है I " लब्ध प्रतिष्ठित बहुमुखी प्रतिभा के धनी और शांति निकेतन की स्थापना कर शिक्षा को नया आयाम देने वाले गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की इन पंक्तियों को स्मृति में रखते हुए स्कूल को यांत्रिकता से सजीवता की ओर ले जाने का पूर्ण प्रयास सदैव रहा है जिसमें शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है I हमारा शिक्षक आदतन जब शिशु की पुकार सुनता है तो उसके अन्दर का आदिम शिशु अपने आप कूदकर बाहर आ जाता है और वह शिशु के अंतर्मन की पहचान कर बहुत सरलता से अपना कार्य कर लेता है I पश्चिमी देशों में बहुतायत और अब भारत में भी परिलक्षित बालकों में हिंसा की निवृति और संवेदनशीलता की प्रवृति जागृत करने हेतु संस्था कटिबद्ध है I विद्यार्थियों में स्वाभिमान, राष्ट्रप्रेम, सहनशीलता, दृढ़ निश्चय, समर्पण और मानव सेवा का भाव चरम तक पहुंचाना हमारा लक्ष्य है I हमारा विनम्र प्रयास है - शिक्षा को चरित्र निर्माण के साथ रोज़गार से भी जोड़ना, गुरु को गुरुत्व उत्तरदायित्वों का बोध कराना एवं शिक्षालय को युगनिर्माण एवं राष्ट्रनिर्माण का साधन बनाना I